🌙SAHIH DEEN صحيح دين🌙
❄मुहर्रम और इमाम हुसैन की विशेषता❄
Post 026
🍃इमाम हसन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) की बेटे की शहादत. - 01🍃
बाग ए हाश्मी का खिलता हुआ फूल, हज़रत क़ासिम, इमाम हसन के साहबज़ादे सिर्फ 19 साल के हैं. आकर इमाम हुसैन के सामने अदब से खड़े हो गए. इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) ने पूछा, 'क़ासिम क्या मामला हैं.' उन्होंने जवाब दिया, 'मेरे वालिद ने उनके आखिरी वक़्त में मुझे एक ताबीज़ दिया और कहा की एक वक़्त आएंगे जब मेरा भाई हुसैन बहुत मुसीबत मे होगा, तब यह ताबीज़ खोलकर उसे पढ़ना और उसके हिसाब से चलना.' इस वक़्त से ज्यादा मुश्किल भरा वक़्त क्या हो सकता है? इसलिए मैंने ताबीज़ खोल और उसमे लिखा हुआ था, 'प्यारे बेटे, कर्बला के जंग में जब वक़्त आ जाए, तो अली अकबर को जंग में मत जाने देना, मगर तुम पहले जाकर अएलाह की राह में शहीद होना.'
'ए चाचा! मैं आपकी इज़ाज़त लेने आया हु ताकि मैं अपने वालिद की आखरी ख्वाइश पूरी कर सकु.' इमाम हुसैन अपने आँसुको सँभालते हुए कहा, 'तुम में मेरे भाई की यादें है, मैं कैसे तुमको शहीद होने की इज़ाज़त दू?' हज़रत क़ासिम ने जवाब दिया, 'ए चाचा! अगर मैं नहीं गया और अली अकबर मुझसे पहले शहीद हो गए तो मैं क़यामत के दिन अपने वालिद को क्या मुह दिखाऊंगा?' जब हज़रत क़ासिम ने आज़िज़ी की तो इमाम हुसैन ने भारी दिल और आंसू भरी आँखों के साथ उन्हें विदा किया.
दुश्मनो के काबिले से एक फौजी, हमीद बिन मुस्लिम कहते है, 'जब हज़रत क़ासिम आगे आये तोह इस लगा जैसे क्षितिज से चाँद निकल रहा है. उनके जिस्म मुबारक पे कोई कवच नहीं था और उन्हें बेसब्री से शहादत का इंतज़ार था. उन्होंने यज़ीदी फ़ौज को ललकारा, "ए इस्लाम के दुश्मनो, मैं क़ासिम बिन हसन बिन अली हू, रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के घर का चिराग. तुम्हे जंग करने के लिए जिससे भेजना हो उसे भेजो."'
(......आगे जारी रहेगा.)
🌹🌹🌹
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👑Sufyan 📲+918460300402
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बाग ए हाश्मी का खिलता हुआ फूल, हज़रत क़ासिम, इमाम हसन के साहबज़ादे सिर्फ 19 साल के हैं. आकर इमाम हुसैन के सामने अदब से खड़े हो गए. इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) ने पूछा, 'क़ासिम क्या मामला हैं.' उन्होंने जवाब दिया, 'मेरे वालिद ने उनके आखिरी वक़्त में मुझे एक ताबीज़ दिया और कहा की एक वक़्त आएंगे जब मेरा भाई हुसैन बहुत मुसीबत मे होगा, तब यह ताबीज़ खोलकर उसे पढ़ना और उसके हिसाब से चलना.' इस वक़्त से ज्यादा मुश्किल भरा वक़्त क्या हो सकता है? इसलिए मैंने ताबीज़ खोल और उसमे लिखा हुआ था, 'प्यारे बेटे, कर्बला के जंग में जब वक़्त आ जाए, तो अली अकबर को जंग में मत जाने देना, मगर तुम पहले जाकर अएलाह की राह में शहीद होना.'
'ए चाचा! मैं आपकी इज़ाज़त लेने आया हु ताकि मैं अपने वालिद की आखरी ख्वाइश पूरी कर सकु.' इमाम हुसैन अपने आँसुको सँभालते हुए कहा, 'तुम में मेरे भाई की यादें है, मैं कैसे तुमको शहीद होने की इज़ाज़त दू?' हज़रत क़ासिम ने जवाब दिया, 'ए चाचा! अगर मैं नहीं गया और अली अकबर मुझसे पहले शहीद हो गए तो मैं क़यामत के दिन अपने वालिद को क्या मुह दिखाऊंगा?' जब हज़रत क़ासिम ने आज़िज़ी की तो इमाम हुसैन ने भारी दिल और आंसू भरी आँखों के साथ उन्हें विदा किया.
दुश्मनो के काबिले से एक फौजी, हमीद बिन मुस्लिम कहते है, 'जब हज़रत क़ासिम आगे आये तोह इस लगा जैसे क्षितिज से चाँद निकल रहा है. उनके जिस्म मुबारक पे कोई कवच नहीं था और उन्हें बेसब्री से शहादत का इंतज़ार था. उन्होंने यज़ीदी फ़ौज को ललकारा, "ए इस्लाम के दुश्मनो, मैं क़ासिम बिन हसन बिन अली हू, रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के घर का चिराग. तुम्हे जंग करने के लिए जिससे भेजना हो उसे भेजो."'
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