Friday, October 14, 2016

मुहर्रम - मुहर्रम और इमाम हुसैन की विशेषता

🌙SAHIH DEEN صحيح دين🌙

❄मुहर्रम और इमाम हुसैन की विशेषता❄
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🍃इमाम हसन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) की बेटे की शहादत -  02🍃

अम्र बिन साद ने अर्जक नाम के एक पहलवान को निर्देश दिया की वह चुनौती स्वीकार करले, मगर उसने यह कहकर इनकार किया की वह एक बच्चे से लड़ने नहीं आया. अम्र ने इस बात को दोहराया, 'इसे बच्चा मत समझो, यह हसन का बेटा है जो अली के बेटे है, जिसने अकेले खैबर के किले का दरवाजा को उखाड़ा था. भले ही यह तीन दिन से भूखा प्यासा है, इससे लड़ना आसान नहीं है.' अर्जक अपनी बात पे अटल था मगर अपने बड़े बेटे को  भेज दिया यह सोच कर की वो मिनटो में काम तमाम कर देंगा. मगर मिनटो में हालात उलटे हो गए और अर्जक का बेटा ज़मीन पर पड़ा था और मर रहा था और हज़रत क़ासिम उसकी तलवार लिए हुए थे. इसके दुसरे बेटे को जूनून आ गया और हज़रत क़ासिम पे हमला करने गया मगर वह भी हज़रत क़ासिम के पहले हमले का शिकार हुआ और जहन्नुम में पहुँच गया. अब तीसरा भाई गालियाँ देते हुए लड़ने के लिए कूद पड़ा. हज़रत क़ासिम ने कहा, 'यह अहले बैत के तरीक़ो में नहीं की गाली का जवाब गली से दिया जाए; बजाये उसके, मैं तुम्हे तुम्हारे भाई तक पहुंच देता हूँ. एक ही वार में उसके दो टुकड़े हो गए. अर्जक का चौथा और आखिरी बेटा भी उसी तरह मीट गया.

रज़ाक अब क्रोध और भय से कांप रहा था। उसका अपना सारा गुमान धूल में मिल गया था। वो अब हाशमी शेर का मुक़ाबला करने के लिए मजबूर हो गया। वो एक गर्जना के साथ मैदान में दाखिल हुआ और खाली चुनौतियों देने लगा जैसे 'मारने केलिए तैयार हो जाओ.' हज़रात क़ासिम नेजवाब दिया, 'तुम अपना होश खो चुके हो अर्जक, हम शेरे खुदा के खून है, तुम हमारे सामने कुछ भी नहीं.' दोनों ने एक दूसरे पे भाले से हमला किया मगर दोनों निशाने चूक गए. फिर तलवार निकाली गयी. जब लड़ाई शुरू हुई, हज़रात क़ासिम हँसने लगे और अर्जक से कहा, 'तुम मुझसे लड़ने के दर से अपने घोड़े की लगाम कसना भी भूल गए.' जैसे ही अर्जक लगाम देखने के लिए निचे झुक, हज़रात क़ासिम ने  आखिरी हमला किया और उसे दो टुकड़े में कर दिया.

हज़रत क़ासिम ने घोड़े को घुमाया और इमाम हुसैन के काफिले की और चल पड़े और व्यक्त करने लगे, 'ए चाचा! फिरसे प्यास हुआ हू. अगर मुझे एक प्याला पानी मिल जाए, तो मैं इन सब दुश्मनो को जहन्नुम में पंहुचा दूंगा.' इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) ने जवाब दिया, 'थोड़ी और देर रुको बेटे, तुम जल्द ही अपने नाना के पास होंगे जो तुमको कौसर के तालाब से जाम पिलायेंगे, उसके बाद तुम कभी प्यासे नहीं होंगे.'

हज़रत क़ासिम जंग के मैदान में लौटे. अम्र ने अपने लोगो को आवाज़ लगायी, 'इसे घेर लो और मार दो.' हज़रत कासिम सभी जगह से दुश्मनों से घिरे हुए थे. मगर उन्होंने हौसला नही छोड़ा. आप निडर होकर लड़ते रहे और अपने जिस्म पर 27 जख्म खाये जब आखिर में शीश बिन साद ने उनकी छाती से एक भाला घुसा दिया. घोड़े से गिरते हुए आप कहने लगे, 'ए चाचा! आओ और मुझे देखो.' जब इमाम हुसैन "(रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) ने उनकी आवाज़ सुनी, तो आप दौड़ पड़े और जवान जिस्म को जख्म से भरा हुआ पाया. आप ने हज़रात क़ासिम (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) का सर अपने गोद में लिया और उसपर से मिटटी साफ़ करने लगे. हज़रात क़ासिम ने अपनी आँखे खोली और अपना सर इमाम के गोद में पाया. आप मुस्कुराये और आपकी मुबारक रूह परवाज़ कर गयी.
(इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन)
[तारिख ए कर्बला, शाम ए कर्बला का हवाला]

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