🌙SAHIH DEEN صحيح دين🌙
❄मुहर्रम और इमाम हुसैन की विशेषता❄
Post 029
💪🏻हजरत अली अकबर (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) का साहस.💪🏻
इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) के सभी साथी और परिवार के सदस्य शहीद हो चुके थे और आप अपने तीनो फरजंद; इमाम ज़ैनुल अबिदीन, हज़रत अली अकबर और हज़रत अली असगर (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) के साथ अकेले बचे थे. हज़रत ज़ैनुल अबिदीन बहुत बीमार थे, हज़रत अली असगर अभी बहुत चोट बच्चे थे और हज़रत अली अकबर अब अठ्ठारह साल के हो चुके थे. इसलिए इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) ने फैसला किया की अब जंग के मैदान में खुद जाएंगे. मगर हज़रत अली अकबर ने आपको रोक लिया और आज़िज़ी करने लगे, 'ए प्यारे वालिद! मेरे ज़िंदा होते हुए आप कैसे जाकर लड़ सकते हो? मेहेरबानी करके मुझे जाकर लड़ने दीजिये.' इमाम हुसैन ने उन्हें आँखों में आंसुओ के साथ देखा और कहा, 'मैं कौनसे दिल से तुमको जाने दू? मैं कैसे तुमको मिटटी और खून में लतपथ देखु? यज़ीदी फ़ौज को मेरा खून चाहिए और एक बार वह मुझे मार दे, उन्हें तुमसे कोई मतलब न होंगे.' मगर हज़रत अली अकबर सुनने वाले नहीं थे. आख़िरकार इमाम हुसैन ने उन्हें जाकर लड़ने की इज़ाज़त दी.
जब हज़रत अली अकबर (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) जाने के लिए तैयार हो गए तो इमाम हुसैन ने अपने हाथो से अपने खूबसूरत और सुंदर बेटे को सजा कर भेजा. आपने उन्हें अपनी तलवार दी, घोड़े पे चढ़ाया और उनके हथियार उन्हें दिए. हज़रत अली अकबर ने इमाम हुसैन और घर की औरतो को आखिरी अलविदा की नज़र से देखा और दुश्मन की और चल दिए. हज़रत अली अकबर रसूलल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) से दिखने में को मिलते जुलते थे. जब आपने दुश्मनो को मुक़ाबले के लिए ललकारा, तो किसी के पास सामना करने की हिम्मत नहीं थी. इसलिए आपने खुद को दुश्मनों की कतारों पर जोर दिया और उन्हें तितर-बितर कर दिया. आप ने उस वक़्त तक मुक़ाबला किया जब तक आपको प्यास की शिद्दत बर्दाश्त न हुई.
आप खेमे में लौटे और अपने वालिद से पानी के लिए आजिज़ी करने लगे. इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) उनके जिस्म से धुल साफ़ करने लगे और फिर अपनी मुबारक ऊँगली अपने बेटे के मुह में रख दी ताकि उससे तसल्ली हो. हज़रत अली अकबर फिर एक बार जंग के मैदान में आ गए. फिर किसी के पास उनको सामना करने के लिए हिम्मत इकट्ठा न कर सके.
अम्र बिन साद बार बार अपने लोगो को भारी इनामो से उकसाया करते थे, आखिर एक लोभी पहलवान तारिक़, हज़रत अली अकबर से मुक़ाबला करने के लिए तैयार हो गया. मगर वह हज़रत अली अकबर के पहले तीर में मारा गया. उसका बेटा, अम्र बिन तारिक़ जो उसके बाद आया वह भी ज्यादा देर तक रह नहीं पाया और मारा गया. फिर दूसरा बेटा तलहा बिन तारिक़ भी उन्ही के रास्ते चला गया. अब पूरी फ़ौज खौफ से काँप रही थी. हज़रत अली अकबर का सामना करने को कोई तैयार नहीं था. फिर अम्र बिन साद ने मुहकम बिन तुफैल को एक हज़ार आदमियो के साथ हमला करने को कहा. हज़रत अली अकबर को ये डरपोक ने अपने आदमियो के साथ चारो तरफ से घेर लिया और आक्रामक हमला शुरू किया. बहुत जल्द आपका जिस्म घाव से भर गया. जब आप ज़मीन पर गिर गए, तो आपने भी आवाज़ लगायी, 'ए मेरे वालिद, मेरी खबर लीजिये.' इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) अपने बेटे को कम में लाये और उनका सर अपने गॉड में रख कर उसे साफ़ करने लगे. हज़रत अली अकबर (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) ने अपनी आँखे खोली, अपने वालिद का मुबारक चेहरा आखिरी बार देखा
और अपने रब की ख़ुशनूदी के पास चले गए.
(इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन)
🌹🌹🌹
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इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) के सभी साथी और परिवार के सदस्य शहीद हो चुके थे और आप अपने तीनो फरजंद; इमाम ज़ैनुल अबिदीन, हज़रत अली अकबर और हज़रत अली असगर (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) के साथ अकेले बचे थे. हज़रत ज़ैनुल अबिदीन बहुत बीमार थे, हज़रत अली असगर अभी बहुत चोट बच्चे थे और हज़रत अली अकबर अब अठ्ठारह साल के हो चुके थे. इसलिए इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) ने फैसला किया की अब जंग के मैदान में खुद जाएंगे. मगर हज़रत अली अकबर ने आपको रोक लिया और आज़िज़ी करने लगे, 'ए प्यारे वालिद! मेरे ज़िंदा होते हुए आप कैसे जाकर लड़ सकते हो? मेहेरबानी करके मुझे जाकर लड़ने दीजिये.' इमाम हुसैन ने उन्हें आँखों में आंसुओ के साथ देखा और कहा, 'मैं कौनसे दिल से तुमको जाने दू? मैं कैसे तुमको मिटटी और खून में लतपथ देखु? यज़ीदी फ़ौज को मेरा खून चाहिए और एक बार वह मुझे मार दे, उन्हें तुमसे कोई मतलब न होंगे.' मगर हज़रत अली अकबर सुनने वाले नहीं थे. आख़िरकार इमाम हुसैन ने उन्हें जाकर लड़ने की इज़ाज़त दी.
जब हज़रत अली अकबर (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) जाने के लिए तैयार हो गए तो इमाम हुसैन ने अपने हाथो से अपने खूबसूरत और सुंदर बेटे को सजा कर भेजा. आपने उन्हें अपनी तलवार दी, घोड़े पे चढ़ाया और उनके हथियार उन्हें दिए. हज़रत अली अकबर ने इमाम हुसैन और घर की औरतो को आखिरी अलविदा की नज़र से देखा और दुश्मन की और चल दिए. हज़रत अली अकबर रसूलल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) से दिखने में को मिलते जुलते थे. जब आपने दुश्मनो को मुक़ाबले के लिए ललकारा, तो किसी के पास सामना करने की हिम्मत नहीं थी. इसलिए आपने खुद को दुश्मनों की कतारों पर जोर दिया और उन्हें तितर-बितर कर दिया. आप ने उस वक़्त तक मुक़ाबला किया जब तक आपको प्यास की शिद्दत बर्दाश्त न हुई.
आप खेमे में लौटे और अपने वालिद से पानी के लिए आजिज़ी करने लगे. इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) उनके जिस्म से धुल साफ़ करने लगे और फिर अपनी मुबारक ऊँगली अपने बेटे के मुह में रख दी ताकि उससे तसल्ली हो. हज़रत अली अकबर फिर एक बार जंग के मैदान में आ गए. फिर किसी के पास उनको सामना करने के लिए हिम्मत इकट्ठा न कर सके.
अम्र बिन साद बार बार अपने लोगो को भारी इनामो से उकसाया करते थे, आखिर एक लोभी पहलवान तारिक़, हज़रत अली अकबर से मुक़ाबला करने के लिए तैयार हो गया. मगर वह हज़रत अली अकबर के पहले तीर में मारा गया. उसका बेटा, अम्र बिन तारिक़ जो उसके बाद आया वह भी ज्यादा देर तक रह नहीं पाया और मारा गया. फिर दूसरा बेटा तलहा बिन तारिक़ भी उन्ही के रास्ते चला गया. अब पूरी फ़ौज खौफ से काँप रही थी. हज़रत अली अकबर का सामना करने को कोई तैयार नहीं था. फिर अम्र बिन साद ने मुहकम बिन तुफैल को एक हज़ार आदमियो के साथ हमला करने को कहा. हज़रत अली अकबर को ये डरपोक ने अपने आदमियो के साथ चारो तरफ से घेर लिया और आक्रामक हमला शुरू किया. बहुत जल्द आपका जिस्म घाव से भर गया. जब आप ज़मीन पर गिर गए, तो आपने भी आवाज़ लगायी, 'ए मेरे वालिद, मेरी खबर लीजिये.' इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) अपने बेटे को कम में लाये और उनका सर अपने गॉड में रख कर उसे साफ़ करने लगे. हज़रत अली अकबर (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) ने अपनी आँखे खोली, अपने वालिद का मुबारक चेहरा आखिरी बार देखा
और अपने रब की ख़ुशनूदी के पास चले गए.
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