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तलाक़ और इद्दत
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🏠इद्दत के प्रकार - 02🏡
हमें रसूलल्लाह का ये फरमान है की तलाक़ देने से पहले अपनी औरते की इद्दत के बारे में सोच ले. इसका मतलब ये है की तलाक़ देने के वक़्त औरत पाक और अपने शोहर से तालुकात न होने चाहिए जिससे इद्दत का वक़्त लंबा न हो जाए और औरत को दूसरा निकाह करने के लिए इद्दत ख़तम होने का लंबा इंतज़ार न करना पड़े. अल्लाह त'आला फरमाते है:
يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ إِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاء فَطَلِّقُوهُنَّ لِعِدَّتِهِنَّ وَأَحْصُوا الْعِدَّةَ وَاتَّقُوا اللَّهَ رَبَّكُمْ لَا تُخْرِجُوهُنَّ مِن بُيُوتِهِنَّ وَلَا يَخْرُجْنَ إِلَّا أَن يَأْتِينَ بِفَاحِشَةٍ مُّبَيِّنَةٍ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ اللَّهِ فَقَدْ ظَلَمَ نَفْسَهُ لَا تَدْرِي لَعَلَّ اللَّهَ يُحْدِثُ بَعْدَ ذَلِكَ أَمْراً
“ऐ नबी! जब तुम लोग स्त्रियों को तलाक़ दो तो उन्हें तलाक़ उनकी इद्दत के हिसाब से दो। और इद्दत की गणना करो और अल्लाह का डर रखो, जो तुम्हारा रब है। उन्हें उनके घरों से न निकालो और न वे स्वयं निकलें, सिवाय इसके कि वे कोई स्पष्ट। अशोभनीय कर्म कर बैठें। ये अल्लाह की नियत की हुई सीमाएँ है - और जो अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करे तो उसने स्वयं अपने आप पर ज़ुल्म किया - तुम नहीं जानते, कदाचित इस (तलाक़) के पश्चात अल्लाह कोई सूरत पैदा कर दे.”
(अत-तलाक - 1)
ये इस्लामी कानून की बहुत बड़ी मेहेरबानी है की उसका उद्देश्य औरतो के लिए तकलीफ काम होने के लिए मर्दो को ये हुक्म देता की अगर वो अपनी बीवी को तलाक़ देना चाहे तो उसे उसकी बीवी की इद्दत को ध्यान में रखकर ये सोचना चाहिए के उसकी बीवी को कम इद्दत गुजरने का वक़्त आये. जैसे पहले बताया गया, इसका मतलब ये है की उन्हें तब तलाक़ दो जब वो अपने पाक दिनों में हो और तुमने उनसे कोई रिश्ते न बनाये हो. अगर उन्हें ये वक़्त के दौरान तलाक़ दी जाए, तो उन्हें सिर्फ तीन हैज़ तक की इद्दत आये. इस्लामी कानून में इद्दत का बहुत महत्व होने की वजह से हमें ये ख़ास ध्यान रखकर इद्दत के दिनों की गिनती सही करनी चाहिए. वो औरते जो रजोनिवृत्ति (55 साल की उम्र के बाद मासिक धर्म का बन्द होना) से निकल चुकी हो या जो उससे नहीं निकली हो उन सब के लिए इद्दत का वक़्त बाकी साधारण हैज़ के दिनों की गिनती के हिसाब से होगी और हामिला औरत के लिए चाहे वह बेवा हो या तलाक़ दी हो, इद्दत का वक़्त इस प्रकार बताया गया है:
وَاللَّائِي يَئِسْنَ مِنَ الْمَحِيضِ مِن نِّسَائِكُمْ إِنِ ارْتَبْتُمْ فَعِدَّتُهُنَّ ثَلَاثَةُ أَشْهُرٍ وَاللَّائِي لَمْ يَحِضْنَ وَأُوْلَاتُ الْأَحْمَالِ أَجَلُهُنَّ أَن يَضَعْنَ حَمْلَهُنَّ وَمَن يَتَّقِ اللَّهَ يَجْعَل لَّهُ مِنْ أَمْرِهِ يُسْراً
“और तुम्हारी स्त्रियों में से जो मासिक धर्म से निराश हो चुकी हों, यदि तुम्हें संदेह हो तो उनकी इद्दत तीन मास है और इसी प्रकार उनकी भी जो अभी रजस्वला नहीं हुई। और जो गर्भवती स्त्रियाँ हो उनकी इद्दत उनके शिशु-प्रसव तक है। जो कोई अल्लाह का डर रखेगा उसके मामले में वह आसानी पैदा कर देगा.”
(अत-तलाक - 4)
बेवा औरतो की इद्दत के बारे में सुरह अल-बक़रा में फ़रमाया गया है. अल्लाह त'आला फरमाता है:
وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجاً يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْراً فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلاَ جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا فَعَلْنَ فِي أَنفُسِهِنَّ بِالْمَعْرُوفِ وَاللّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ
"और तुममें से जो लोग मर जाएँ और अपने पीछे पत्नियों छोड़ जाएँ, तो वे पत्नियों अपने-आपको चार महीने और दस दिन तक रोके रखें। फिर जब वे अपनी निर्धारित अवधि (इद्दत) को पहुँच जाएँ, तो सामान्य नियम के अनुसार वे अपने लिए जो कुछ करें, उसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं। जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है."
(अल-बक़रा - 234)
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