Thursday, November 3, 2016

Divorce and Waiting Period

🌙SAHIH DEEN صحيح دين🌙

तलाक़ और इद्दत
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☑ज़रूरी है तलाक़☑

कभी ये वाजिब और ज़रूरी हो जाता है की तलाक़ के हथियार का इस्तेमाल किया जाए और रिश्ते को ख़त्म किया जाए. जैसे के, अगर एक आदमी नपुंसक पैदा होता है या कालाजादु या कोई और बिमारी की वजह से वो अपनी बीवी से शोहबत करने और उसे खुश रखने में नाकामयाब रहता हो और उसके इलाज का कोई तरीक़ा न दीखता हो, तो आदमी को खुद उसकी बीवी को तलाक़ देकर अलग करना चाहिए क्योंकि ये हालात में औरत के जिन में शामिल होने का डर बहुत रहता है. अगर औरत बहुत नेक है फिर भी वो अपने शोहर से शांति से न रह पाएंगी और एक शादीधूदा परिवार न बन पाएंगे. अगर आदमी उसकी औरत को इस वक़्त अलग नहीं करता है तोह वो शर्मिंदा रहेगा की उसने अपनी बीवी को सताया और उसके लिए ज़िन्दगी बेहतर न बना सका, या यह बात से शर्मिंदा होगा की वो अपनी बीवी को गुनाह में धकेल रहा है और यह दोनों बड़े गुनाहों में से है. इस गुनाहों से बचने के लिए उसे अपनी बीवी को तलाक़ दे देनी चाहिए.

यह फरमाया गया है की ये बेहतर और पसंदीदा काम है की ऐसे कुछ हालात में तलाक़ हो जाए. जैसे की, औरत नमाज़ नहीं पढ़ती हो, या अपने शोहर के परिवार या अपनी शादी को कोसती हो, या किसी गैर मर्द की तरफ मायिल हो, या अपने शोहर की धन और संपत्ति के साथ बेईमानी करती हो. इन सब हालात में ऐसी औरत को तलाक़ देकर अपने आप को उससे होने वाले नुक्सान से बचाना और आज़ाद करना ज़रूरी है. फिर भी, ये तभी करना चाहिए जब इस्लामी तरीके से या बाकी सारे तरीके से सुलह का कोई रास्ता न बाकी रहा हो.

इस ही एक किस्सा रसूलल्लाह के दरबार में पेश किया गया हैब हबीब बीनते सहल, थाबित बिन क़ैस की बीवी, आयी और अपने शोहर से खुला करवाने के लिए इज़ाज़त मागी क्योंकि वे खूबसूरत नहीं थी, काम ऊंचाई के थे जबकि हज़रत हबीब, जो अब्दुल्लाह बिन उबै की बेहेन है, बहुत खूबसूरत और ऊँची थी. इसलिए आप को हज़रत थाबित मनमोहक नहीं लगते थे, आप रसूलल्लाह के पास आयी और कहा, "मुझे हज़रत थाबित के चरित्र से कोई मसला नहीं है, आप बहुत दीनदार और बहुत अच्छे इंसान हो. मगर मैं अपने ईमान में बेवफाई को दाखिल नहीं करना चाहती क्योंकि मैं सिर्फ उनकी मुह से तारीफ करती हु, मगर दिल से मुहब्बत नहीं. यह धोखा है जिसकी इस्लाम में इज़ाज़त नहीं है, इसलिए मेहेरबानी करके आप उनसे कहिये के वह मुझे तलाक़ दे दे." यह सुनने पर रसूलल्लाह ने अपना गुस्सा न ज़ाहिर करते हुए उनसे पूछा, "क्या तुम थाबित को वह बाग़ दे सकती हो जो उसने तुमको मैहर के रूप में दिए है.?" आपने जवाब दिया की वह देंगी. रसूलल्लाह ने हज़रत थाबित को बुलाया और कहा, "थाबित यह बाग़ ले लो और और इसे एक तलाक़ दे दो." हज़रत थाबित ने आपकी आज्ञा का पालन करते हुए एक तलाक़ दे दी.

ये वाक़ये से साफ़ ज़ाहिर है की अगर मिया बीवी के बीच मुहब्बत नहीं रही और वे एक दूसरे को नापसंद करते हो, प्यार न करते हों या मनमोहक न लगता हो तो उन्हें साथ रहने को ज़बरदस्ती नहीं करना चाहिए, उनके लिए ये बेहतर है की वो तलाक़ करके अलग हो जाए.

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