🌙SAHIH DEEN صحيح دين🌙
❄मुहर्रम और इमाम हुसैन की विशेषता❄
Post 015
🔎हीरा का हादसा.🔍
यज़ीद की फ़ौज ने जब मदीना मुनव्वराह पे कब्ज़ा किया तो उन्होंने एक भी इंसान पे ज़ुल्म ओ सितम गुज़ारना बाकी नहीं रखा था. रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के हज़ारो सहाबी शहीद किये गए. करीब हर घर के कीमती सामान को लूट गया और यह बहुत डरावना था, रसूलअल्लाह (सलअल्लाहू अलैहे वसल्लम) के मुबारक शहर में हज़ारो औरतो का शोषण किया गया. (इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजीऊन)
🚫इमाम हुसैन (रदीअल्लाहो त'आला अन्हु) ने शपथ लेने से क्यों इनकार किया?🚫
हजरत अमीर मुआवियाह (रदीअल्लाहो त'आला अन्हु) का रजब, हिजरी ६० में इन्तेक़ाल हो गया, तो उनका ज़ालिम बेटा यज़ीद, नेता के रूप में पदभार संभाल लिया। इसके तुरंत बाद, उसने देश भर में लोगों को उसे अपने नेता के रूप में स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करने के लिए दूत भेजा।
उसने मदीना के राज्यपाल, वालिद बिन उक्बाह के साथ भी वही किया, और उनसे कहा कि वे अपने लोगों से शपथ ले।
ख़ास तौर पे, उसने बड़ी बड़ी हस्तियों जैसे हज़रत इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु), हज़रत अब्दुर रहमान बिन हज़रत अब बक्र (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु), हज़रत अब्दुल्लाह बिन उम्र (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) और हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) अजमईन का शपथ लेने को कहा और उन्हें सोचने का वक़्त भी नहीं दिया. जैसे ही आपको यह न्योता मिला, वलीद ने हज़रत इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) को उनके राज्यपाल के घर बुलाया और यज़ीद का शपथ लेने को कहने लगे.
इमाम हुसैन ये ऐलान करने में काफी साफ़ बोलने वाले थे कि यज़ीद, उसकी बुरी आदतों और भ्रष्ट सोच की वजह से, मुसलमानों का नेता होने के लायक नहीं था और वह एक ऐसे व्यक्ति के प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा नहीं करेंगे। इमाम हुसैन (रदीअल्लाह त'आला अन्हु) के निर्णय को मालूम होने पर, वालिद ने शांति से उन्हें समझाने की कोशिश की और उन्हें परिणाम को भुगतने की चेतावनी दी। लेकिन जब उन्होंने महसूस किया कि इमाम हुसैन (रदीअल्लाह त'आला अन्हु) एक पहाड़ के जैसे अपने फैसले पे अङ्ग थे तो वह उन्हें सलाह दी घर लौटने के बाद, बात पर गौर करने को कहा और अगले दिन फिर से आने को कहा।
इमाम हुसैन (रदीअल्लाह त'आला अन्हु) यह बात साफ़ जानते थे की अगर उन्होंने यज़ीद को नेता मानने से इनकार किया तो वह उनका सबसे बड़ा दुश्मन बन जाएगा, और उसके बाद यज़ीद उनकी ज़िन्दगी के पीछे पड़ जाएगा. रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के नवासे के लिए यह कैसे मुमकिन था की अपनी ज़िन्दगी बचने के लिए सच्चाई का रास्ता छोड़ कर एक झूठे मक्कार का साथ दे? यह बात साफ़ थी की अगर इमाम हुसैन यज़ीद के प्रति निष्ठां का वादा कर लेते तो वो बहुत शुक्र गुज़ार रहता और आप पे सौगादों की बौछार कर देता, या फिर शायद उन्हें राज्यपाल बना देता. बूत सच्चे इमाम को पता था की इस करने से, इस्लाम के पाए टूट जाते और हर तरफ शोर हो जाता; इस्लामी सिद्धांत बर्बाद हो जाता और इस्लाम का गौरवशाली झंडा फिर से कभी उड़ान भरने लायक नहीं होता क्योंकि जो कुछ भी यज़ीद करता उसपे इमाम हुसैन (रदीअल्लाह त'आला अन्हु) की निष्ठा के रूप में स्वीकृति की मोहर लग जाती. और लोग आँख बंद करके उसका पालन करने लग जाते क्योंकि यज़ीद उनका नेता होता। यह ही एक वजह थी, की क्यों रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के नवासे ने उम्मत की डूबती जहाज को बचाने के लिए, दुश्मनो का सामना करना पसंद किया और सारी मुश्किलो का मुक़ाबला करने को सोचा यहां तक कि उनके पुरे परिवार को उनकी आंखों के सामने कुर्बान होते हुए देखा और अपना भी खून बहाया।
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यज़ीद की फ़ौज ने जब मदीना मुनव्वराह पे कब्ज़ा किया तो उन्होंने एक भी इंसान पे ज़ुल्म ओ सितम गुज़ारना बाकी नहीं रखा था. रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के हज़ारो सहाबी शहीद किये गए. करीब हर घर के कीमती सामान को लूट गया और यह बहुत डरावना था, रसूलअल्लाह (सलअल्लाहू अलैहे वसल्लम) के मुबारक शहर में हज़ारो औरतो का शोषण किया गया. (इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजीऊन)
🚫इमाम हुसैन (रदीअल्लाहो त'आला अन्हु) ने शपथ लेने से क्यों इनकार किया?🚫
हजरत अमीर मुआवियाह (रदीअल्लाहो त'आला अन्हु) का रजब, हिजरी ६० में इन्तेक़ाल हो गया, तो उनका ज़ालिम बेटा यज़ीद, नेता के रूप में पदभार संभाल लिया। इसके तुरंत बाद, उसने देश भर में लोगों को उसे अपने नेता के रूप में स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करने के लिए दूत भेजा।
उसने मदीना के राज्यपाल, वालिद बिन उक्बाह के साथ भी वही किया, और उनसे कहा कि वे अपने लोगों से शपथ ले।
ख़ास तौर पे, उसने बड़ी बड़ी हस्तियों जैसे हज़रत इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु), हज़रत अब्दुर रहमान बिन हज़रत अब बक्र (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु), हज़रत अब्दुल्लाह बिन उम्र (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) और हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) अजमईन का शपथ लेने को कहा और उन्हें सोचने का वक़्त भी नहीं दिया. जैसे ही आपको यह न्योता मिला, वलीद ने हज़रत इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) को उनके राज्यपाल के घर बुलाया और यज़ीद का शपथ लेने को कहने लगे.
इमाम हुसैन ये ऐलान करने में काफी साफ़ बोलने वाले थे कि यज़ीद, उसकी बुरी आदतों और भ्रष्ट सोच की वजह से, मुसलमानों का नेता होने के लायक नहीं था और वह एक ऐसे व्यक्ति के प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा नहीं करेंगे। इमाम हुसैन (रदीअल्लाह त'आला अन्हु) के निर्णय को मालूम होने पर, वालिद ने शांति से उन्हें समझाने की कोशिश की और उन्हें परिणाम को भुगतने की चेतावनी दी। लेकिन जब उन्होंने महसूस किया कि इमाम हुसैन (रदीअल्लाह त'आला अन्हु) एक पहाड़ के जैसे अपने फैसले पे अङ्ग थे तो वह उन्हें सलाह दी घर लौटने के बाद, बात पर गौर करने को कहा और अगले दिन फिर से आने को कहा।
इमाम हुसैन (रदीअल्लाह त'आला अन्हु) यह बात साफ़ जानते थे की अगर उन्होंने यज़ीद को नेता मानने से इनकार किया तो वह उनका सबसे बड़ा दुश्मन बन जाएगा, और उसके बाद यज़ीद उनकी ज़िन्दगी के पीछे पड़ जाएगा. रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के नवासे के लिए यह कैसे मुमकिन था की अपनी ज़िन्दगी बचने के लिए सच्चाई का रास्ता छोड़ कर एक झूठे मक्कार का साथ दे? यह बात साफ़ थी की अगर इमाम हुसैन यज़ीद के प्रति निष्ठां का वादा कर लेते तो वो बहुत शुक्र गुज़ार रहता और आप पे सौगादों की बौछार कर देता, या फिर शायद उन्हें राज्यपाल बना देता. बूत सच्चे इमाम को पता था की इस करने से, इस्लाम के पाए टूट जाते और हर तरफ शोर हो जाता; इस्लामी सिद्धांत बर्बाद हो जाता और इस्लाम का गौरवशाली झंडा फिर से कभी उड़ान भरने लायक नहीं होता क्योंकि जो कुछ भी यज़ीद करता उसपे इमाम हुसैन (रदीअल्लाह त'आला अन्हु) की निष्ठा के रूप में स्वीकृति की मोहर लग जाती. और लोग आँख बंद करके उसका पालन करने लग जाते क्योंकि यज़ीद उनका नेता होता। यह ही एक वजह थी, की क्यों रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के नवासे ने उम्मत की डूबती जहाज को बचाने के लिए, दुश्मनो का सामना करना पसंद किया और सारी मुश्किलो का मुक़ाबला करने को सोचा यहां तक कि उनके पुरे परिवार को उनकी आंखों के सामने कुर्बान होते हुए देखा और अपना भी खून बहाया।
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