Wednesday, October 5, 2016

मुहर्रम - मुहर्रम और इमाम हुसैन की विशेषता

🌙SAHIH DEEN صحيح دين🌙

❄मुहर्रम और इमाम हुसैन की विशेषता❄
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🐎मदीना मुनव्वराह से रुखसती🐎

यज़ीद ने पहले इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) से निष्ठां की प्रतिज्ञा लेने का सोचा और जैसे ही उसे यह मिलता है तो उसकी प्रतिज्ञा लेने से कोई इनकार नहीं करता.जब इमाम हुसैन ने मना किया तो उसके सारे सपने बिखर गए और वह बॉल हो गया. यज़ीद ने वलीद को सन्देश भेज की अगर इमाम हुसैन प्रतिज्ञा लेने से इनकार करते है, तो उनको मार दिया जाए और उनका सर यज़ीद को भेज जाए. जब वालिद को ऐसे काफी सारे सन्देश मिले, तो उन्हें जबरन इमाम हुसैन को यज़ीद के नापाक इरादे के बारे में बताना पड़ा. इमाम हुसैन ने सहाबी से मश्वरा किया और मदीना छोड़ने का फैसला किया.

सोचो इमाम हुसैन की क्या हालात हुई होंगी जब आप रसूलल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) को आखरी सलाम करने गए होंगे? दुःख के पहाड़ और आँखों में आंसू लेकर आप रोये होंगे, 'ए नाना, जिसने हमें अपने कंधो पे बिठाया था, जिसने हमारी पेशानी चूमि थी, जिसने हमारे लिए अपनी दुआ लंबी की थी हमारी हालात देखये. हमपे बुरे लोग जबरदस्ती से सबसे प्यारी जगह छोड़ने को कह रहे है, हमें जाने की इज़ाज़त दे. या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम).'

रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) का हाल सोचो, `जब आप अपनी आँखों से उसे जाते हुए देख रहे थे जिनको आपने बेहद्द प्यार किया, अपनी प्यारी बेटी के प्यारे बेटे. आखिर वे इमाम हुसैन थे, जिसके लिए रसूलअल्लाह ने अपना खुदका बीटा क़ुर्बान किया था. इमाम हुसैन को थोड़ी सी तकलीफ होती तो रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) नाराज़ घो जाते. ये वह सोच है जिसकी वजह से रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) और अहले बैत के आशिक़ परेशान, अस्तव्यस्त और दिल शोक में आ जाता है.

रौदतउस शोहदा में फरमाता गया है की इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) पहले जन्नतुल बक़ी अपनी मुबारक वालिदा सैय्यदा फातिमा और अपने भाई इमाम हसन को सलाम पेश करने गए और उसके बाद रसूलल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के मुबारक रौज़े पर गए. अपना सलाम पेश करने और रसूलल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) को अपनी हालात से वाकेफ करने के बाद, आपको नींद लग गयी.

आपने अपने सपने में देखा की रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) ने उनका सर अपने गोद में रखे हुए थे. इमाम हुसैन ने पूछा, 'या रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम), मुझे आपके मुबारक शहर से कुछ बुरे तत्वो ध्वारा जबरदस्ती निकाला जा रहा है और मुझे लगता है की मैं यहाँ वापिस कभी नहीं लौट पाऊंगा. रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) ने जवाब दिया, 'तुम जल्दी ही मेरे पास होंगे और मैं ये देख रहा हु की तुमको बेरहमी से भूखे और प्यासे कर्बला में क़त्ल किया जा रहा है. ए हुसैन, जल्दबाज़ी करो और अपना काम ख़तम करो. बहुत जल्द तुम अपने वालिद, अपनी वालिदा और अपने भाई के पास होंगे और हमारे साथ बेथ कर तुम अल्लाह की नेमत का मज़ा ले रहे होंगे.'

बस तभी, इमाम हुसैन (रदी'अल्लाहो त'आला अन्हु) बेदार होते है और उनको यकीन हो जाता है की उनकी शहादत नज़दीक है. इस वजह से, हिजरी ६० की ४थि शाबान को आपने मदीना के लोगो को गम में दाल कर अपने घरवालो और साथियो के साथ मदीना मुनव्वराह छोड़ कर मक्का मुकर्रामा की और चल दिया. आप शाबान में मक्का पहुचे और अगले ४ महीने रमजान, शव्वाल, ज़िल क़द और ज़िल हज वही गुज़ारे. मक्का के लोग ख़ुशी से बहुत गर्व महसूस करने लगे की रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के नवासे उनके बीच रह रहे थे.

तब मक्का के राज्यपाल सईद बिन आस थे, जो यज़ीद के चुने हुए थे. इमाम हुसैन को आते हुए देख कर और आपकी अहमियत देख कर आपने यज़ीद को इक्तिला किया, जिससे वह और भड़क गया.

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